दीक्षा संस्कार

शक्तिपात

गुरू कारूण्य रहित बहिर्मुख पुरूष केवल बुद्धि के बल पर बहुत श्रवण करके या प्रवचन से आत्मविद्या नहीं पा सकता। इसे पाने के लिये सद्गुरू प्रसाद की आवश्यकता है। यह सद्गुरू प्रसाद उन्हीं की अनन्य भक्ति भाव से सेवा करके ही प्राप्त किया जाता है अन्य किसी उपाय से यह संभव नहीं। सद्गुरू प्रसाद सद्शिष्य को शक्तिपात से प्राप्त होता है और शक्तिपात के साथ सद्गुरू के महावाक्य का उपदेश होने से शिष्य कृतार्थ हो जाता है। वेदान्त वाक्य से प्राप्त विद्या जब शक्तिपात के साथ जिस व्यक्ति में संयुक्त होती है तब उसी क्षण वह मुक्त हो जाता है। ऐसे शक्ति सम्पन्न सद्गुरू की शरण में जाने को महर्षियों ने कहा है। शक्तिपात, ज्ञान दान करने वाले सद्गुरू का सुन्दर वर्णन धर्म ग्रथों में मिलता है कि, इस त्रिभुवन में ज्ञानदाता सद्गुरू के लिये देेने योग्य कोई दृष्टांत ही नहीं दिखता। उन्हें पारसमणि की उपमा दे तो यह भी ठीक नहीं जंचती, कारण पारस लोहे को तो सोना बना देता है पर पारस नहीं बनाता, परंतु सद्गुरू चरण युगल का आश्रय करने वाले शिष्य को निज साम्य ही दे ड़ालते हैं। इसलिये ऐसे सद्गुरू की कोई उपमा नहीं।

शक्तिपात क्या है

सद्गुरू की दृष्टि जिस पर चमकती है अथवा यह करारविन्द जिसे स्पर्श करता है, वह होने को चाहे जीव ही हो पर बराबरी करता है महेश्‍वर श्री शंकर की।

— –गुरु कृपा ही केवलम– –

शक्तिपात दीक्षा किस प्रकार होती है

भगवान श्री कृष्ण ने जब शरणागत भक्त शिरोमणी अर्जुन को अपने सुवर्ण कंकण विभूषित दक्षिण बाहु को फैलाकर अपने हृद्य से लगा लिया। हृद्य-हृद्य एक हो गये। इस हृद्य में जो था वह उस हृद्य में डाल दिया। द्वैत का नाता बिना तोड़े अर्जुन को अपने जैसा बना लिया। ”अधिकारी शिष्य में सद्गुरू के द्वारा चाक्षुषी प्रवृत्ति दीक्षा के द्वारा परमेश्‍वर की ज्ञानात्मिका पराशक्ति का पात किया जाता है, जो शक्ति का संचार होता है। शिष्य में पहले से मौजूद आत्मस्वरूपभूत पराशक्ति जो मल, कर्मादि पाशबन्ध से घिरी हुई है उसे ही दीक्षा संस्कार के द्वारा आवरण को हटाकर अभिव्यक्त किया जाता है, इसके इस तरह अभिव्यक्त होने को शक्तिपात कहा जाता है।